"दिल मुसाफ़िर" ~ Poem by Abhansh Srivastava 💙🤍 [Wrote On: 29th December, 2025]

 

ढूँडे मेरी राहें किसको आख़िर 

यहाँ वहाँ फिरे किसकी ख़ातिर 

ऐसे कैसे हुआ? दिल मुसाफ़िर 

दिल मुसाफ़िर, दिल मुसाफ़िर 


रूठा मेरा दिल है किसकी ख़ातिर 

ना है कोई साथ यहाँ मेरी ख़ातिर 

नाराज क्यों है फ़िर? दिल मुसाफ़िर 

जब मनाने को साथ ना कोई? दिल मुसाफ़िर


बिन पूछे क्यों बेसबर सी 

ये राह मुड़ने लगी 

जाना मुझे किधर था 

लेकर मुझे ये किधर चली? 

रोके मुझसे ना रुके ये 

ये राह लड़ने लगी 

खोले दिल के राज़ 

ये राह बेमंज़िल हुई 

आँखों में ख़्वाबों की बसतियाँ लिए 

ये राह मुझको ले चली 


रूठा मेरा दिल है किसकी ख़ातिर 

ना है कोई साथ यहाँ मेरी ख़ातिर 

नाराज क्यों है फ़िर? दिल मुसाफ़िर 

जब मनाने को साथ ना कोई? दिल मुसाफ़िर


बस अब सफ़र को ही ख़बर है 

ये मंज़िल अब जिदर है 

डर भी लगता हमसफ़र है 

मुसाफ़िर दिल भी लगता बेसबर है 

शायद राहों में मंज़िल तलाशना ही इसका सफ़र है 


~ अभांश श्रीवास्तव 💙🤍

(⭐️नज़्म का नाम: दिल मुसाफ़िर)


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